बच्चों में यौवन शिक्षा की कमी


 इंडिया के लोग जागरूक तो कम करते है अश्लीलता

अश्लीलता ज्यादा फैलाते हैं। जबकि एक 10 15 वर्ष का बच्चा इन सब के बारे में अपने आप जान जाता है। फिर भी लोगों को लगता है कि वह कुछ नहीं जानता। इन्होंने भी जाना था जब यह 10 15 साल के थे?


यह बात काफी हद तक सही है और यह हमारे समाज में एक आम विरोधाभास को दर्शाती है। यह सिर्फ अश्लीलता तक सीमित नहीं है, बल्कि यौन शिक्षा और बच्चों के प्रति समाज के रवैये से जुड़ा एक व्यापक मुद्दा है।


आइए बिंदुओं का विश्लेषण करें:


1. "इंडिया के लोग जागरूक तो कम करते है

अश्लीलता अश्लीलता ज्यादा फैलाते हैं । "



• समाज का दोहरा मापदंड (Double Standards): यह एक बड़ी सामाजिक समस्या है। हम एक तरफ यौनता और अश्लीलता को लेकर सार्वजनिक रूप से बहुत रूढ़िवादी और नैतिक होने का दिखावा करते हैं, लेकिन दूसरी तरफ, वही सामग्री अक्सर छिप-छिपकर या अनौपचारिक माध्यमों से बड़े

पैमाने पर प्रसारित होती है। यह पाखंड ही जागरूकता की कमी और "अश्लीलता" के प्रसार का कारण बनता है।

खुली चर्चा का अभाव : भारत में यौन शिक्षा और यौन स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने से अक्सर परहेज़ किया जाता है। इसे "अश्लील " या "शरारतपूर्ण" मानकर टाल दिया जाता है। इस खुलेपन की कमी के कारण, बच्चों और किशोरों को सही जानकारी नहीं मिल पाती और गलत स्रोतों से या गलत तरीके से सीखते हैं। डिजिटल प्रसार: इंटरनेट और स्मार्टफोन के आगमन ने अश्लील सामग्री तक पहुंच को बहुत आसान बना दिया है। जहां पहले इसे ढूंढना मुश्किल था, वहीं अब यह कुछ ही क्लिक की दूरी पर है, जिससे इसका अनियंत्रित प्रसार हो

रहा है।


2. " जबकि एक 10-15 वर्ष का बच्चा इन सब

के बारे में अपने आप जान जाता है।'


जानकारी की सहज उपलब्धता: आप बिल्कुल सही कह रहे हैं। आज के डिजिटल युग में, बच्चों और किशोरों के लिए किसी भी तरह की जानकारी (यौन सामग्री सहित) तक पहुंचना बहुत आसान हो गया है। वे अपने दोस्तों से, इंटरनेट से, सोशल मीडिया से, और विभिन्न

में


अन्य माध्यमों से इन विषयों के बारे में बहुत कुछ सीखते हैं।

उत्सुकता और विकास: किशोरावस्था एक ऐसा चरण है जहाँ बच्चों में स्वाभाविक रूप से अपने शरीर, यौनता और रिश्तों के बारे में जिज्ञासा विकसित होती है। यह उनके शारीरिक और मनोवैज्ञानिक विकास का एक सामान्य

हिस्सा है।


अधूरी या गलत जानकारी का खतरा: जब उन्हें अपने माता-पिता, शिक्षकों या अन्य विश्वसनीय वयस्कों से सही, उम्र- उपयुक्त और वैज्ञानिक जानकारी नहीं मिलती, तो वे अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए गलत या विकृत स्रोतों की ओर मुड़ते हैं। इससे उन्हें अधूरी, भ्रामक, या हानिकारक जानकारी मिलने का खतरा होता है, जो उनके विचारों और व्यवहार को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती है।


3. "फिर भी लोगों को लगता है कि वह कुछ नहीं

जानता। इन्होंने भी जाना था जब यह 10-15

साल के थे।"


•पीढ़ियों का अंतर: यह एक क्लासिक पीढ़ियों का अंतर है। वयस्क अक्सर यह भूल जाते हैं कि वे खुद भी किशोरावस्था से गुज़रे हैं और उन्हें भी वैसी ही जिज्ञासाएँ थीं। उन्हें लगता है कि उनके बच्चे इन "बुरी" चीजों से दूर रहें, इसलिए वे उनसे इस बारे में बात करने से बचते हैं।


• सुरक्षा का भ्रम: माता-पिता को लगता है कि अगर वे इस बारे में बात नहीं करेंगे, तो उनके बच्चे इस बारे में जानेंगे ही नहीं या इन चीजों में रुचि नहीं लेंगे। यह एक गलत धारणा है जो बच्चों को अधिक असुरक्षित बनाती है क्योंकि वे बिना मार्गदर्शन के जानकारी ढूंढते हैं।

"पवित्रता" का विचार: समाज में बच्चों की

"पवित्रता" के विचार को बनाए रखने की एक

मजबूत प्रवृत्ति है, खासकर यौन मामलों में। इस विचार के कारण अक्सर यौन शिक्षा को "बच्चों को बिगाड़ने " वाला माना जाता है, बजाय इसके कि यह उन्हें सुरक्षित और सूचित रखने का एक तरीका है।


क्या होना चाहिए?


• जागरूकता और शिक्षा: समाज को अश्लीलता को सिर्फ "बुरा" कहकर उससे मुंह मोड़ने के बजाय, यौन स्वास्थ्य और रिश्तों के बारे में खुली, उम्र- उपयुक्त और वैज्ञानिक शिक्षा

को बढ़ावा देना चाहिए।



• विश्वसनीय स्रोत: माता-पिता और शिक्षकों को बच्चों के लिए यौन जानकारी के विश्वसनीय स्रोत बनना चाहिए, ताकि बच्चे गलत और हानिकारक स्रोतों से दूर रहें।


• नैतिक शिक्षा: यह सिर्फ यौन शिक्षा की बात नहीं है, बल्कि सम्मान, सहमति, निजता, और ऑनलाइन सुरक्षा जैसे व्यापक नैतिक मूल्यों को भी बच्चों में विकसित करना महत्वपूर्ण है।


कानूनी प्रवर्तन: अश्लील या आपत्तिजनक सामग्री के अवैध प्रसार को रोकने के लिए कानूनी प्रवर्तन को मजबूत करना भी आवश्यक है।


 बात बिल्कुल सही है कि हमें इस सामाजिक

पाखंड को पहचानना होगा और बच्चों के प्रति अधिक यथार्थवादी और सहायक दृष्टिकोण अपनाना होगा। उन्हें अज्ञानता में रखने से वे सुरक्षित नहीं होते, बल्कि उन्हें सही जानकारी से वंचित किया

जाता है।

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